अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े लोग ही एससी का लाभ ले सकते हैं, ईसाई बनने पर नहीं मिलेंगे कानूनी संरक्षण
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों को ही मिल सकता है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करता है, तो वह अनुसूचित जाति का दर्जा और उससे जुड़े कानूनी लाभ खो देता है।
खास बातें
केवल हिंदू सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े लोग ही अनुसूचित जाति का दर्जा पाने के पात्र
धर्म परिवर्तन करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है
ईसाई धर्म अपनाने के बाद एससी एसटी एक्ट के तहत संरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता
आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्म परिवर्तन करना संविधान के साथ धोखा माना गया
धर्म में वापसी के बाद भी एससी दर्जा पाने के लिए ठोस प्रमाण और समुदाय की स्वीकृति जरूरी
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि ईसाई धर्म अपनाने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मिलने वाले संरक्षण का दावा नहीं कर सकता। अदालत ने साफ किया कि एससी का दर्जा धर्म आधारित व्यवस्था से जुड़ा है, इसलिए धर्म परिवर्तन के बाद यह अधिकार स्वतः समाप्त हो जाता है।
किस मामले में आया फैसला
यह निर्णय आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मई 2025 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनाया गया। याचिकाकर्ता चिंथदा आनंद, जो पहले अनुसूचित जाति (माला समुदाय) से थे, ने ईसाई धर्म अपनाने के बाद पादरी के रूप में कार्य शुरू कर दिया था।
उन्होंने आरोप लगाया था कि उनके साथ जातिगत भेदभाव और दुर्व्यवहार किया गया, जिसके आधार पर उन्होंने एससी एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था।
जांच में क्या सामने आया
मामले की जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद चिंथदा का अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र रद्द कर दिया गया था। वे पिछले करीब 10 वर्षों से चर्च में पादरी के रूप में कार्य कर रहे हैं।
पहले भी स्पष्ट कर चुका है सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने 1985 के एक महत्वपूर्ण फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद फिर से हिंदू धर्म में लौटता है, तो उसे एससी का दर्जा पाने के लिए विश्वसनीय प्रमाण और संबंधित समुदाय की स्वीकृति आवश्यक होगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल आरक्षण का लाभ लेने के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन करना संविधान की भावना के विपरीत है।सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि अनुसूचित जाति का दर्जा धर्म से जुड़ा हुआ है और धर्म परिवर्तन के साथ ही इससे जुड़े सभी अधिकार समाप्त हो जाते हैं। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
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